काफल खाने को मिलेंगे क्या इस बार?

काफल खाने को मिलेंगे क्या इस बार?

इस बार काफल खाने को शायद ही मिलें!
ऐसा ही लग रहा फिर इस बार, आप लोगों को भी लग रहा क्या?

काफल के पीछे एक कहानी बताई जाती है कि उत्तराखंड के किसी गांव में एक मां और बेटी रहती थी, दोनों ही एक दूसरे का सहारा थी। घर की आमदनी चलाने के लिए महिला अनेक काम किया करती थी लेकिन जब गर्मियों का मौसम आता था तो वह जंगल जाकर काफल तोड़ लाती और उन्हें बेच कर अपने घर का गुजारा चलाती थी। एक दिन बेटी के रसीले काफलों को देख कर उन्हें खाने की इच्छा मां से जताई लेकिन मां ने बेचने है कह कर उन्हें काफलों का ध्यान रखने के लिए कह कर खेतों में काम करने चले गई।

जब खेतों से थकी हारी वह घर पहुंची और थोड़ी देर बाद उसे काफलों का ख्याल आया तो उसे टोकरी (छपरी) में काफल कम लगे जो धूप के कारण सूख कर कम हो गए थे, लेकिन उसका शक अपनी बेटी पर गया कि उसने ही सुबह काफल खाने की इच्छा जाहिर की थी उसी ने इन्हे खाया होगा। वह गुस्से से तिलमिलाती हुई अपनी सोई बेटी को उठाती है और उसे मारते हुए पूछती है बता तूने ही कफल खाए ना। मैंने तुझसे कहा था यह बेचने के लिए रखे गए हैं इन्हें बेच कर घर में दो पैसे आते और तुझे मना करने के बाद भी तू इन्हें खा गई।

यह कहते कहते वह अपनी लड़की को बेहिसाब मारती गई और एक चोट से उसकी बेटी का सिर जाके पत्थर से लगता हैं और वह मर जाती है। धीरे धीरे जब उसका गुस्सा शांत होता है तो उसे एहसास होता है कि उसने एक छोटी सी बात के लिए अपनी बेटी की जान ले ली है जो उसका एकमात्र सहारा थी और उसे यह भी एहसास होता है कि काफल सूखने से कम हुए थे।

अपनी बेटी के वियोग में मां भी रो रोकर अपने प्राण त्याग देती है । कहा जाता है मरने के बाद यह दोनों मां बेटिया एक पक्षी का रूप ले लेती हैं ।

आजकल हम सुनते है एक पक्षी को गाते हुए कि –
काफल पाको मिल नी चाखो (काफल पके है लेकिन मैंने नहीं चखे)।

तो इस पर दूसरी पक्षी कहती है –
पुर पुतई पुर पुर (पूरे है बेटी पूरे है)।।

यह काफल से जुड़ी उत्तराखंड की एक प्रसिद्ध लोककथा है।

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About हिमालय रावत

बेरीनाग से हैं, अल्मोड़ा कैंपस से पढाई की, रचनात्मक कार्यों से जुड़ें हैं। ORIGINALLY HIMALAYAN नाम से YouTube चैनल है।