प्रेम का ये पाठ मेने खुद से ही पढ़ लिया

प्रेम का ये पाठ मेने खुद से ही पढ़ लिया

प्रेम का ये पाठ मेने खुद से ही पढ़ लिया,
भोले भंडारी शिव हूँ मै जब प्रेम में रम गया,
जब हुआ क्रुद्ध तो हूँ रुद्र सा संहारक,
प्रेम वात्सल्य में अर्धनारीश्वर शिव भया।

हूँ राम से योद्धा जब प्रेयसी दुख में भयी,
हूँ श्याम से मनमोहक में जब प्रेयसी सुख में भई।
परशुराम हूँ जब प्रेम पिता से किया,
अंजानये हनुमान हूँ जब मा का प्रेम मिला।

तू सोच कर यूँही कुछ भी इच्छा कर,
में भीम सा पहाड़ हूँ जो देवलोक में अड़ पढ़ा।

जब हो बात सम्मान की ,
में अग्नि परीक्षा का ताप हूँ।
में दक्ष संहारक हूँ,
में महादेव का छाप हूँ।

जो प्रेयसी की मृत देह को,
दुख में लेके सदियो घुमा।
में वो महादेव हूँ जिसने प्रेम फिर चुना।

में यक्ष हूँ मै देव हूँ,
में हूँ विजय में ज्ञान हूँ।
सबसे में महान हूँ,
पर तब भी एक तीस है,
उस प्रेयसी की प्रीत है,
जो देखती है मुझमे बस,
दसानन रावण सदा।

में रुद्र सा क्रुद्ध हूँ,
सुद्ध हूँ विशुध्द हूँ।
प्रेम के द्वंद में,
विजित भी में पराजित भी में,
उस सक्ति को जरा ये बता दो कोई,
ये सब नजर के फेर है,
प्रेम में हुए सब ढेर है।