कैंची मंदिर

कैंची मंदिर

कुछ समय पहले प्रिंट और सोशल मीडिया की सुर्ख़ियों में भारत का एक मंदिर था, जब मार्क ज़करबर्ग ने बताया कि फेसबुक के बुरे समय में बाबा जी का आशीर्वाद लेने वे – भारत के एक मंदिर आये थे और बाबा जी के आशीवार्द से उन्हें उनके बिज़नेस में इतनी बड़ी सफलता मिली।

उन्होंने बताया कि वो यहाँ एप्पल कंपनी के फाउंडर स्टीव जॉब्स की सलाह पर आये थे, जो कुछ वर्ष पूर्व कैंची मंदिर में आ चुके थे, और स्टीव जॉब्स ने बतया कि वो अपने निराशा से भरे, मुश्किल समय में – यही से सकारात्मक ऊर्जा और आशीर्वाद लेने के बाद, वो एप्पल कंपनी को नयी ऊंचाई पर ले जा सके.

आप में से कई लोग तो समझ ही गए होंगे किस मंदिर की बात हो रही है, और बहुत संभव हैं – कि आप इस मंदिर के दर्शन कर चुके हों।

उत्तराखंड के नैनीताल जिले में कैंची नाम की जगह में बाबा नीम करोली महाराज का कैंची धाम आश्रम, नैनीताल से 20 किलोमीटर दूर नैनीताल-अलमोड़ा रोड़ पर समुद्र तल से 1400 मीटर ऊंचाई पर स्थित है। कैंची मंदिर का परिसर रोड से लगा हैं, कुछ सीढिया उतर कर मंदिर और आश्रम तक पंहुचा जा सकता हैं, मंदिर के निकट सड़क के किनारे गाड़ियों के खड़े करने के लिए पार्किंग हैं, एकदम व्यस्त सीजन न हो तो आमतौर पर गाड़िया पार्क करने के लिए जगह मिल जाती हैं| मंदिर और आश्रम परिसर में श्रृदालु शीतकाल में नवंबर से मार्च तक सुबह 7 बजे से शाम 6 बजे तक और शेष वर्ष सुबह 6 से सायं 7 बजे तक जा सकते हैं|

मंदिर चारों ओर से ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों से घिरा हुआ है और मंदिर में हनुमान जी के अलावा भगवान राम एवं सीता माता तथा देवी दुर्गा जी के भी छोटे-छोटे मंदिर बने हुए हैं। किन्तु कैंची धाम मुख्य रूप से बाबा नीम करौली और हनुमान जी की महिमा के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ आने पर व्यक्ति अपनी सभी समस्याओं के हल प्राप्त कर सकता है । हर किसी ने बाबा के चमत्कारों के आगे शीश नवाजा है। बाबा के दर पर मन्नतें लेकर आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या कभी भी कम नहीं रही, लेकिन विदेश तक बाबा की ख्याति होने के बाद से भक्तों की संख्या यहाँ लगातार बढ़ती जा रही हैं|

25 मई 1962 को बाबा नीम करोली महाराज ने अपने पावन चरण प्रथम बार इस भूमि पर रखे थे, यह जगह उन्हें बहुत पसंद आयी, और शिप्रा नाम की छोटी पहाड़ी नदी के किनारे उन्होंने, अपने भक्तो के सहयोग से कैंचीधाम की नींव रखी। यहां दो घुमावदार मोड़ है जो कि कैंची के आकार के हैं इसलिए इस जगह का नाम कैंची पड़ा।

15 जून 1976, को महाराजजी की मूर्ति की स्थापना और अभिषेक हुआ। महाराजजी ने स्वयं 15 जून को कैंची धाम के अभिषेक के रूप में तय किया था। उस दिन वातावरण उत्साही था और हर किसी को बाबाजी महाराज की शारीरिक उपस्थिति महसूस हो रही थी। फिर वेदों के भजनों के साथ और पवित्र समारोह और पूजा की निर्दिष्ट विधि के साथ, महाराजजी की मूर्ति स्थापित की गई । इस तरह, एक मूर्ति के रूप में बाबाजी महाराज श्री केन्ची धाम में बैठे हैं।

देवभूमि उत्तराखंड की अलौकिक वादियों में से एक दिव्य रमणीक लुभावना स्थल है “कैंची धाम”। कैंची धाम जिसे नीम किरौली धाम भी कहा जाता है, उत्तराखंड का एक ऐसा तीर्थस्थल है, जहां वर्षभर श्रद्धालुओ का तांता लगा रहता है। अपार संख्या में भक्तजन व श्रद्धालु यहां पहुचकर अराधना व श्रद्धा पुष्प श्री नीम किरौली के चरणों में अर्पित करते है। कैंची धाम में प्रतिवर्ष – 15 जून को बड़ा मेला होता हैं, जिसमे देश विदेश के लाखों श्रद्धालु (bhakt) शामिल होते है, प्रसाद पातें हैं और बाबा का आर्शीवाद प्राप्त करते है ।



महाराजजी का संक्षिप्त परिचय :

नीम करोली बाबा का वास्तविक नाम लक्ष्मीनारायण शर्मा था। बाबा नीम करोली महाराज जी को बाबा लक्ष्मण दास के नाम से भी जाना जाता है। उनका जन्म सन 1900 के आसपास उत्तरप्रदेश के अकबरपुर गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। 17 वर्ष की आयु में उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई। महाराज जी के दो प्रमुख आश्रम हैं, एक वृन्दावन और दूसरा कैंची में। बाबा ने अपनी समाधि के लिए वृंदावन की पवित्र भूमि को चुना। 10 सितंबर 1973 मध्य रात्री मैं रामकृष्ण मिशन हॉस्पिटल, वृन्दावन मे बाबा ने शरीर त्याग दिया और निरंकार मे लीन हो गए।

बाबा नीम करोली आश्रम में हर वर्ष लाखो श्रृदालु आते हैं, और बाबा जी का आशीर्वाद पाते हैं बाबा सशरीर अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन वे ईश्वरीय अवतार थे, ईश्वर कभी मरते नहीं, उनकी करुणा, दया और आशीर्वाद अब भी श्रदालुओं पर बरसते हैं, बाबा नीम करोली महाराज हनुमान जी के अवतार कहे जाते हैं.

बाबा के बारे में लोग बाबा के समय के भक्तो से सुने/ लिखे किस्से बताते हैं – बाबा कही भी प्रकट और अंतर्ध्यान हो सकते थे, और उन्हें होने वाली घटनाओ का पूर्व से ज्ञान होता था, परन्तु बाबा स्वयं सादगी पसंद और दिखावे से दूर रहते थे, हाँ जन कल्याण की भावना से किये उनकी कई कहानियां सुनी जाती हैं बाबा पर ईश्वर की असीम कृपा थी.

ब्रिटिश काल में एक टिकट परीक्षक ने भारतीय साधु बाबा नीब करोली का अपमान कर – प्रथम श्रेणी के कोच से बाहर निकाल दिया, इसके बाद बहुत कोशिश के बाद भी ट्रेन आगे नहीं बढ़ पायी, और इसके बाद रेलवे कर्मी को अपनी गलती का अहसास हुआ, बाबा से माफ़ी मांग, ससम्मान उन्हें सीट में बैठाया – तब ट्रेन आगे बढ़ी.

रिचर्ड एलपर्ट (रामदास) ने नीम करोली बाबा के चमत्कारों पर ‘मिरेकल ऑफ़ लव’ नामक एक किताब लिखी इसी में ‘बुलेटप्रूफ कंबल’ नाम से एक घटना का जिक्र है। बाबा के कई भक्त थे। उनमें से ही एक बुजुर्ग दंपत्ति थे जो फतेहगढ़ में रहते थे। यह घटना 1943 की है। एक दिन अचानक बाबा उनके घर पहुंच गए और कहने लगे वे रात में यहीं रुकेंगे। दोनों दंपत्ति को अपार खुशी तो हुई, लेकिन उन्हें इस बात का दुख भी था कि घर में महाराज की सेवा करने के लिए कुछ भी नहीं था। हालांकि जो भी था उन्हों बाबा के समक्ष प्रस्तुत कर दिया। बाबा वह खाकर एक चारपाई पर लेट गए और कंबल ओढ़कर सो गए।

दोनों बुजुर्ग दंपत्ति भी सो गए, लेकिन क्या नींद आती। महाराजजी कंबल ओढ़कर रातभर कराहते रहे, ऐसे में उन्हें कैसे नींद आती। वे वहीं बैठे रहे उनकी चारपाई के पास। पता नहीं महाराज को क्या हो गया। जैसे कोई उन्हें मार रहा है। जैसे-तैसे कराहते-कराहते सुबह हुई। सुबह बाबा उठे और चादर को लपेटकर बजुर्ग दंपत्ति को देते हुए कहा इसे गंगा में प्रवाहित कर देना। इसे खोलकर देखना नहीं अन्यथा फंस जाओगे। दोनों दंपत्ति ने बाबा की आज्ञा का पालन किया। जाते हुए बाबा ने कहा कि चिंता मत करना महीने भर में आपका बेटा लौट आएगा। जब वे चादर लेकर नदी की ओर जा रहे थे तो उन्होंने महसूस किया की इसमें लोहे का सामान रखा हुआ है, लेकिन बाबा ने तो खाली चादर ही हमारे सामने लपेटकर हमें दे दी थी। खैर, हमें क्या। हमें तो बाबा की आज्ञा का पालन करना है। उन्होंने वह चादर वैसी की वैसी ही नदी में प्रवाहित कर दी।



लगभग एक माह के बाद बुजुर्ग दंपत्ति का इकलौता पुत्र बर्मा फ्रंट से लौट आया। वह ब्रिटिश फौज में सैनिक था और दूसरे विश्वयुद्ध के वक्त बर्मा फ्रंट पर तैनात था। उसे देखकर दोनों बुजुर्ग दंपत्ति खुश हो गए और उसने घर आकर कुछ ऐसी कहानी बताई जो किसी को समझ नहीं आई। उसने बताया कि करीब महीने भर पहले एक दिन वह दुश्मन फौजों के साथ घिर गया था। रातभर गोलीबारी हुई। उसके सारे साथी मारे गए लेकिन वह अकेला बच गया। मैं कैसे बच गया यह मुझे पता नहीं। उस गोलीबारी में उसे एक भी गोली नहीं लगी। रातभर वह जापानी दुश्मनों के बीच जिन्दा बचा रहा। भोर में जब और अधिक ब्रिटिश टुकड़ी आई तो उसकी जान में जा आई। यह वही रात थी जिस रात नीम करोली बाबा जी उस बुजुर्ग दंपत्ति के घर रुके थे।

प्रेम में सर्वस्व बसता है: महाराजजी बाबा नीब करौरी महाराजजी प्रेम के चमत्कार के रूप में जाने जाते हैं। महाराजजी ने मृत को जीवित किया, पानी को दूध या पेट्रोल में परिवर्तित कर दिया, स्वयं को और अपने साथ-साथ दूसरों को अदृश्य बना लिया, कई रोगों का उपचार किया, और कभी भी औपचारिक “शिक्षण या उपदेश” नहीं दिये। और यह अभी भी हो रहा है।

महाराजी ने कम से कम 108 मंदिरों की स्थापना की, लाखों लोगों को भोजन करवाया, सरकार और कॉर्पोरेट के अग्रणी लोगों को सलाह दी, वे काम किये जिनको चमत्कार कहा जा सकता है, भारत व अमेरिका के वर्तमान समाज को प्रभावित किया अनगिनत पीड़ित लोगों के जीवन में कृपा लाए, और ये सब करते हुए वे जनसाधारण की आखों से दूर रहे।

महाराजजी की शाश्वत शिक्षा और अंतहीन लीलाओं के कारण, हिंदू, मुसलमान, सिख, जैन, ईसाई, यहूदी और यहाँ तक की नास्तिक भी उनकी ओर आकर्षित हुए। भारत के पूर्व राष्ट्रपति वी.वी.गिरी, गोपाल स्वरूप पाठक, जस्टिस वासुदेव मुखर्जी, जुगल किशोर बिड़ला, जैसे सुविख्यात महत्त्वपूर्ण लोग और अनगिनत दूसरे लोग उनके प्रति आकर्षित हे। स्टीब जॉब्स, मार्क ज़करबर्ग, जूलिया रॉबर्ट्स तथा और भी कई पश्चिमी लोग महाराजजी के भक्त हैं।